नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उत्तराखंड की बड़ी उपलब्धि, विशेष श्रेणी के राज्यों में देशभर में मिला दूसरा स्थान

केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की RE-SAF रैंकिंग में उत्तराखंड दूसरे स्थान पर रहा। 5 नवंबर को भारत RE समिट एवं एक्सपो में राज्य को उपराष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किए जाने का कार्यक्रम निर्धारित है।

उत्तराखंड ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की ओर से तैयार किए गए रिन्यूएबल एनर्जी स्टेट असेसमेंट फ्रेमवर्क यानी RE-SAF के तहत उत्तराखंड को विशेष श्रेणी के राज्यों में दूसरा स्थान मिला है। यह उपलब्धि ऐसे समय सामने आई है, जब देश में स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ाने और पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता कम करने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य के लिए यह उपलब्धि विशेष महत्व रखती है, क्योंकि यहां जलविद्युत, लघु जलविद्युत और सौर ऊर्जा के विकास की संभावनाएं मौजूद हैं। राज्य को मिले इस स्थान को सरकार ने ऊर्जा क्षेत्र में किए जा रहे प्रयासों की राष्ट्रीय पहचान के रूप में देखा है। मंत्रालय की ओर से 31 अक्टूबर को भेजे गए पत्र में राज्य को इस उपलब्धि की जानकारी दी गई थी।

RE-SAF के तहत राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रदर्शन का आकलन केवल बिजली उत्पादन के आधार पर नहीं किया जाता, बल्कि नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई नीतियों, निवेश के माहौल और बुनियादी सुविधाओं जैसे कई पहलुओं को भी देखा जाता है। इस मूल्यांकन में ऊर्जा क्षमता में वृद्धि, परियोजनाओं को लागू करने की गति, बिजली ग्रिड की तैयारी और वितरण कंपनियों के प्रदर्शन जैसे विषय शामिल हैं। इसका उद्देश्य यह समझना है कि कौन-सा राज्य स्वच्छ ऊर्जा के विकास के लिए अनुकूल व्यवस्था तैयार कर रहा है। उत्तराखंड को विशेष श्रेणी के राज्यों में दूसरा स्थान मिलना इस बात का संकेत है कि राज्य ने इन क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। हालांकि, इस रैंकिंग को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह विशेष श्रेणी के राज्यों के बीच का स्थान है, न कि देश के सभी राज्यों की संयुक्त सूची में दूसरा स्थान।
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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस उपलब्धि को राज्य की स्वच्छ ऊर्जा नीति और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों से जोड़कर देखा है। सरकार का कहना है कि उत्तराखंड में प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग इस तरह किया जाना चाहिए, जिससे ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के साथ पर्यावरण का संतुलन भी बना रहे। राज्य में सौर ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा देने, घरों और संस्थानों की छतों पर सोलर सिस्टम लगाने तथा जलविद्युत की संभावनाओं का उपयोग करने पर जोर दिया जा रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में छोटे स्तर की ऊर्जा परियोजनाएं स्थानीय जरूरतों को पूरा करने में सहायक हो सकती हैं। यदि इन योजनाओं को सही तरीके से लागू किया जाता है, तो दूरस्थ गांवों में ऊर्जा उपलब्धता बेहतर बनाने और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर तैयार करने में भी मदद मिल सकती है।

उत्तराखंड में ऊर्जा क्षेत्र का विकास कई चुनौतियों के बीच आगे बढ़ता है। राज्य का बड़ा हिस्सा पहाड़ी है और यहां मौसम, भौगोलिक परिस्थितियों तथा पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर परियोजनाएं तैयार करनी पड़ती हैं। जलविद्युत परियोजनाओं के लिए नदी घाटियों और पहाड़ी भूभाग का अध्ययन जरूरी होता है, जबकि सौर ऊर्जा के लिए उपयुक्त स्थान, बिजली ग्रिड से संपर्क और परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता महत्वपूर्ण होती है। किसी भी परियोजना को शुरू करने से पहले स्थानीय लोगों की जरूरतों, पर्यावरणीय प्रभाव और प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम का आकलन करना भी आवश्यक है। इसलिए स्वच्छ ऊर्जा के विकास में केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सुरक्षित और टिकाऊ परियोजनाओं को प्राथमिकता देना भी जरूरी है।

इस उपलब्धि का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में निवेश और तकनीकी विकास से युवाओं के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं। सौर पैनल लगाने, उनकी मरम्मत और रखरखाव, ऊर्जा प्रबंधन, परियोजना निर्माण और तकनीकी सेवाओं में स्थानीय स्तर पर रोजगार विकसित हो सकता है। यदि राज्य सरकार प्रशिक्षण संस्थानों और निजी कंपनियों के साथ मिलकर कौशल विकास कार्यक्रम चलाती है, तो स्थानीय युवाओं को इन क्षेत्रों में काम करने का अवसर मिल सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे सौर संयंत्र और सामुदायिक ऊर्जा परियोजनाएं स्थानीय उद्यमिता को भी प्रोत्साहित कर सकती हैं। इससे पलायन की समस्या से प्रभावित क्षेत्रों को कुछ हद तक आर्थिक गतिविधियों का नया आधार मिल सकता है।

भारत ने वर्ष 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित बिजली क्षमता को 500 गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इस राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने में राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां उसे जलविद्युत और सौर ऊर्जा दोनों क्षेत्रों में अवसर प्रदान करती हैं, लेकिन इन संसाधनों का उपयोग दीर्घकालिक योजना के साथ करना होगा। राज्य को बिजली उत्पादन के साथ ऊर्जा वितरण, भंडारण और ग्रिड की विश्वसनीयता पर भी ध्यान देना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा की उपलब्धता मौसम और प्राकृतिक परिस्थितियों से प्रभावित हो सकती है, इसलिए ऊर्जा व्यवस्था को संतुलित बनाए रखने के लिए आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रबंधन की जरूरत है।

5 नवंबर को भारत RE समिट एवं एक्सपो-2026 के समापन सत्र में उत्तराखंड को सम्मानित किए जाने का कार्यक्रम निर्धारित है। इस अवसर पर उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन द्वारा राज्य को सम्मान प्रदान किए जाने की जानकारी पहले जारी रिपोर्टों में दी गई थी। यह सम्मान राज्य के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पहचान का अवसर होगा। हालांकि, असली चुनौती इस उपलब्धि को आगे बढ़ाते हुए आम लोगों तक स्वच्छ ऊर्जा का लाभ पहुंचाने की है। सरकार के सामने अब यह जिम्मेदारी होगी कि नीतिगत उपलब्धियों को जमीन पर उतारा जाए, परियोजनाओं में पारदर्शिता बनी रहे और स्थानीय समुदायों को विकास का लाभ मिले। यदि उत्तराखंड ऊर्जा उत्पादन, पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन के बीच संतुलन बना पाता है, तो यह रैंकिंग राज्य के भविष्य के लिए एक मजबूत आधार बन सकती है।