93 रोल्स रॉयस का मालिक वो संन्यासी, जिसका शौचालय प्रसिद्ध अभिनेता द्वारा साफ किया गया था

The monk who owns 93 Rolls Royce, whose toilet was cleaned by the famous actor

11 दिसंबर 1931 को मध्य प्रदेश के कुचवाड़ा गांव में एक बच्चे का जन्म हुआ। नाम रखा गया चंद्र मोहन जैन.बच्चा अन्य बच्चों की तरह ही बड़ा हुआ, लेकिन यह बचपन से अलग था। मैं हमेशा प्रश्न पूछता रहता था और नई चीज़ें आज़माता रहता था। जब उन्होंने स्कूल समाप्त किया और विश्वविद्यालय में प्रवेश किया, तो उनका अपने प्रोफेसर के साथ बहस हो गई। शिक्षक ने शिकायत की कि लड़के ने इतने सारे प्रश्न पूछे कि उन्हें उन्हें पढ़ाने का समय नहीं मिला। मैं कोर्स भी पूरा नहीं कर सकता. यही बालक आगे चलकर आचार्य रजनीश या ओशो के नाम से जाना गया।

विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर से बहस ( The monk who owns 93 Rolls Royce, whose toilet was cleaned by the famous actor)

वसंत जोशी ने अपनी पुस्तक ओशो, द ब्रिलियंट रिबेल: द लाइफ स्टोरी ऑफ ए मेवरिक मिस्टिक में लिखा है कि दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के साथ बहस के बाद चंद्र मोहन जैन को जबलपुर में हितकारिणी विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया था। उस समय उनका नाम पूरे शहर में जाना जाता था। उनके स्वभाव को सभी भलीभांति जानते थे। कोई भी विश्वविद्यालय उन्हें स्वीकार करने को तैयार नहीं था। किसी तरह मुझे डीएन जैन कॉलेज में दाखिला मिल गया।

आध्यात्मिक गुरु बनने की शुरुआत ( Beginning of Becoming a Spiritual Guru)

साल 1957 में जब रजनीश (Acharya Rajneesh) सिर्फ 26 साल के थे तब उन्होंने रायपुर के संस्कृत विश्वविद्यालय में बतौर प्रवक्ता नौकरी शुरू की. 3 साल बाद 1960 में जबलपुर यूनिवर्सिटी आ गए और दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर बन गए. वह पढ़ाने में इतना रम गए कि उनके टक्कर का कोई और प्रोफेसर दिखाई नहीं देता था. थोड़े दिनों बाद वह धर्म, राजनीति और समाज के तमाम जटिल विषयों पर प्रवचन देने लगे.

उन्होंने सेक्स पर बात करनी शुरू की. उस वक्त सेक्स शब्द को ही टैबू माना जाता था और सार्वजनिक तौर पर कोई बात करना पसंद नहीं करता था. कुछ वक्त बाद रजनीश ने प्रोफेसर की नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह आध्यात्मिक गुरु बन गए.

संसद में उठी बैन लगाने की मांग ( Demand for ban raised in Parliament)

विन मैकॉरमक (Win McCormack) अपनी किताब ‘द रजनीश क्रॉनिकल्स’ में लिखते हैं कि ओशो (Osho) के विचार इतने विवादित थे कि कई, मौके पर भारतीय संसद में इसपर चर्चा हुई और उन पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठी. उनके अनुयायियों में हर धर्म, समुदाय, लिंग, नस्ल और आयु के लोग थे.

शिष्यों को ‘स्वामी’ कहकर पुकारा करते थे ( Used to address disciples as ‘Swami’)

ओशो (Osho) ने अपने आध्यात्मिक जीवन के कुछ दिन मुंबई में बिताए. इसके बाद वहां की गर्मी से तंग आकर पुणे में स्थाई आश्रम बनाने का फैसला लिया. यहां का मौसम न ज्यादा गर्म था न सर्द. पुणे के कोरेगांव में आश्रम  (Osho Pune Ashram) बनकर तैयार हुआ और उनके शिष्यों की संख्या बढ़ने लगी.ओशो की सचिव रही मां आनंद शीला के हवाले से लिखता है कि ओशो अपने अनुयायियों को ‘स्वामी’ कहकर पुकारा करते थे.

ओशो के आश्रम में यौन स्वच्छंदता पर बात होती. ओशो अपने शिष्यों को पार्टनर बदलने या साझा करने की सलाह देते. वह अपने प्रत्येक शिष्य को लकड़ी की एक माला देते थे, जिसमें एक लॉकेट लगा होता था. इस लॉकेट में एक तरफ ओशो का चित्र होता. अनुयायियों को हर समय उस लॉकेट को पहनने की सलाह दी जाती और उन्हें लाल या नारंगी कपड़े पहनने को कहा जाता था.

क्यों पुणे छोड़ गए अमेरिका? ( Why did America leave Pune)

अंग्रेजी में प्रवचन देने वाले ओशो (Osho) का मन कुछ दिनों बाद पुणे से भी खटक गया. उन्हें अस्थमा, एलर्जी जैसी कई बीमारियां ने घेर लिया. इसके बाद वह अमेरिका के ओरेगन चले गए. अपने साथ 2000 से ज्यादा अनुयायियों को भी ले गए. जिसमें उस वक्त के बॉलीवुड के स्टार अभिनेता विनोद खन्ना (Vinod Khanna) भी शामिल थे. वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई अपनी किताब ”नेता-अभिनेता: बॉलीवुड स्टार पावर इन इंडियन पॉलिटिक्स” में लिखते हैं कि 1977-78 के दौर में जब विनोद खन्ना अपने करियर के पीक पर थे तब उन्हें जीवन में अकेलापन महसूस होने लगा.

ओशो के शिष्य बन गए विनोद खन्ना ( Vinod Khanna became Osho’s disciple)

विनोद खन्ना, इसी दौर में ओशो के संपर्क में आए. शुरुआत में वह हर हफ्ते ओशो के पुणे स्थित आश्रम जाया करते थे. एक वक्त तो ऐसा आया जब वह अपनी सारी फिल्मों की शूटिंग पुणे में करवाने लगे और फिर अचानक उन्होंने फिल्मों से संन्यास की घोषणा कर दी. उनके इस ऐलान से पूरा बॉलीवुड सन्न था. किसी को उनकी बात पर भरोसा नहीं हुआ. विनोद खन्ना खुद को ”सेक्सी संन्यासी” कहने लग.

विनोद खन्ना, जब वह ओशो के साथ उनके अमेरिका स्थित ‘रजनीशपुरम’ आश्रम गए तो वहां दूसरे अनुयायियों की तरह टॉयलेट साफ करने से लेकर माली तक का काम किया और बर्तन धोए.

क्यों रखी थी 93 रोल्स रॉयस? ( Why were 93 Rolls Royce kept)

ठीक इसी दौर में ओशो को लग्जरी गाड़ियों का चस्का लगा, खासकर रोल्स-रॉयस का. उन्होंने एक-दो नहीं बल्कि 93 रोल्स रॉयस जुटा ली. एक इंटरव्यू में जब उनसे इन गाड़ियों के बारे में पूछा गया कि आखिर एक संन्यासी को इतनी सारी रोल्स-रॉयस की क्या जरूरत है?